रात के 2 बज रहे थे। पूरे कमरे में सिर्फ घड़ी की 'टिक-टिक' गूंज रही थी। अचानक, मेरे फोन की स्क्रीन रोशन हुई। एक अनजान नंबर से मैसेज था— "दरवाजा खोलो, बाहर बहुत ठंड है।" मेरी सांसें अटक गईं। मैं अकेला रहता था और मेरा घर शहर के बिल्कुल आखिरी छोर पर था। मैंने हिम्मत जुटाई और धीरे से खिड़की के परदे हटाकर बाहर झांका... वहां कोई नहीं था। सिर्फ सूनी सड़क थी। तभी मेरे ठीक पीछे से एक सर्द फुसफुसाहट सुनाई दी... "मैंने बाहर का दरवाजा खोलने को कब कहा?"